75th Independence day: Jharkhand News : Story of anonymous revolutionary and great freedom fighter Nageshwar Prasad:उन्होंने अंग्रेजी अफसर पर चलायी थी गोली, आजादी की लड़ाई के दौरान घने जंगल में किया था प्रेस कांफ्रेंस

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रवि सिन्हा, रांची।
देश की आजादी की लड़ाई में कैसे गुमनाम क्रांतिकारी रहे, जिन्हें इतिहास में समुचित स्थान नहीं मिल पाया। ऐसे ही एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे रांची के नागेश्वर प्रसाद। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में अपना पूरा यौवन देश के लिए न्यौछावर कर दिया।

अंग्रेजी हुकूमत की तमाम बंदिशों के बावजूद उन्होंने अपने दो-तीन साथियों के लोहरदगा के बगड़ू पहाड़ स्थित घने जंगल में प्रेस की स्थापना की। उस प्रिंटिंग प्रेस का वजन करीब 500 से 600 किलोग्राम का बताया जाता था। वे इस हस्त लिखित प्रिंटिंग प्रेस के माध्यम से लोगों को क्रांति के लिए जागरूक करते थे।

काकोरी कांड जैसी दूसरी घटना को दिया था अंजाम
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के क्रम में इन्होंने अपने युवा साथियों के साथ मिलकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ कई प्रदर्शनों में मिला और इतिहास में काकोरी कांड की जैसी दूसरी घटना को अंजाम देते हुए अंग्रेजी सरकार के खजाने और हथियार को लूटने का काम किया। इस घटना को रांची-डालटनगंज मार्ग पर अंजाम दिया था।

अंग्रेजी अफसर पर गोली चलायी
आजादी के आंदोलन के दौरान नागेश्वर बाबू का एक अंग्रेज अधिकारी के साथ सीधी भिड़ंत हो गयी। इन्होंने उनपर गोली चलायी, वह किसी तरह से बच गया, लेकिन जवाबी कार्रवाई करते हुए अंग्रेज अधिकारी ने भी गोली चलायी, जो उनके पैर में लगी और जीवन पर्यंत फंसी रही। यही कारण है कि आजादी के बाद अंतिम दिनों में भी वे लंगड़ाकर चलते थे।

पत्नी के अंतिम संस्कार के लिए जेल की दीवार फांद कर भागे
नागेश्वर प्रसाद अंग्रेज के आंखों की इस तरह से किरकिरी बन चुके थे, किसी भी कीमत पर उन्हें ब्रिटिश सरकार पकड़ना चाहती थी, एक मुखबिर की सूचना पर 23 जुलाई 1942 को मांडर के पास घेर कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और बर्फ की सिल्लियों पर घंटों लिटा कर पिटाई की, उनके नाखूनों के बीच सूई चुभोई गयी।

इसके बाद रांची जेल में सजा काटने के दौरान पत्नी की मौत हो गयी। अदालत से पेरौल नहीं मिला, तो वे जेल से भाग निकले। हालांकि श्मशान घाट पर पहले से मौजूद पुलिस ने उन्हें फिर पकड़ लिया, परंतु मुखाग्नि देने की अनुमति दी गयी और फिर वे जेल गये। स्वतंत्रता के बाद इनका इधर-उधर भागना समाप्त हुआ । उनके पौत्र रवि दत्त बताते है कि आजादी के दौरान लगातार इधर-उधर भटकने के दौरान वे अपने साथियों के बीच कविताओं के माध्यम से जोश पैदा करते थे।

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