सुअर पर ज्यादा वार करने वाले गाय के ग्वाला को दिया गया इनाम | The reward given to the cow shepherd who hit the pig more

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बक्सर6 घंटे पहले

बक्सर में दिपावली के दूसरे दिन ग्वाला परिवार के सदस्यों और पशुपालकों ने परंपरागत तरीके से गाय डाढ़ पर्व मनाया। सदियों से चली आ रही ‘गाय-सुअर की कुश्ती’ परम्परा का भी निर्वहन जोश और उत्साह के साथ किया गया। सुअर के पैर में रस्सी बांध पशुपालक अपनी गाय भैसों से उसे मरवाने की कोशिश कर रहे थे।गाय और सुअर की लड़ाई में अछाई की प्रतीक गाय जीतऔर बुराई का प्रतीक सुअर को बार बार भागने के कारण हार हुआ मान लिया गया।

पशुपालक अपने मवेशियों के साथ दोपहर में पूजा स्थल पर पहुंचने लगे थे। जहां पूरे पारंपरिक तरीके से पूजा और अनुष्ठान का कार्य पूरा किया गया।इसे लेकर गाय-भैंस अन्य मवेशियों को नहला धुलाकर घी सिंदूर के टीके लगाए गए। इस पूजा को लेकर एक जाति विशेष में अधिक आस्था-उत्साह देखा गया।

बक्सर जिले के विभिन्न जगहों पर दीपावली के दूसरे दिन गोबर्धन पूजा के अवसर पर कई जगहों पर ग्रामीणों ने इस परंपरा का हर्षोल्लास के साथ निर्वाह किया।हालंकि यह पूजा जिले के हर गांव में नही होती है।यह वीडियो चौगाई प्रखण्ड की है जहां विशेष जाती समुदाय के लोग इसे मनाते है। जिस व्यक्ति की गाय जीती, उसके मालिक को नकद पुरस्कार दिया गया। उसके बाद प्रसाद का वितरण किया गया।

चौगाई के चन्द्र शेखर सिंह ने बताया कि गाय-सुअर लड़ाई की परंपरा बाप-दादा के जमाने से चली आ रही है। इसे बुराई पर अछाई के विजय के रूप में मनाया जाता है।उनके पूर्वज बताते थे कि एक बार सुअर के रूप में एक दैत्य ने पृथ्वी पर यदुवंशियों के ऊपर घोर अत्याचार किया। भगवान कृष्ण ने गौ का रूप धारण कर अपने खुरों से उसका वध कर दिया। तभी से इसे निभाने की परंपरा चली आ रही है। इसमें गाय के साथ सुअर की भी पूजा की जाती है।

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