ठंड से बचने के लिए आदिवासियों का धारचूला के ऊंचे क्षेत्रों से निचली घाटियों में आना शुरू – to escape the cold, tribals started coming from the higher areas of dharchula to the lower valleys.

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पिथौरागढ़, 26 अक्टूबर (भाषा) उत्तराखंड के पिथौरागढ जिले में धारचूला उपमंडल के दारमा घाटी के ऊंचाई वाले गांवों– सिपू और मार्चा के 36 से अधिक आदिवासी परिवार बुधवार को शीतकालीन प्रवास के लिए निचली घाटी में स्थित अपने मकानों में पहुंच गए।

जिले के ऊंचाई वाले 34 गांवों के 600 से अधिक आदिवासी परिवार अत्यधिक ठंड से बचने के लिए हर साल ऊंचाई वाले स्थानों से निचले स्थानों पर आ जाते हैं ।

सिपू की ग्राम प्रधान शांति देवी ने कहा, “पहले हम अपने गांव से सड़क तक पहुंचे और फिर वहां से अपने पालतू जानवरों के साथ 60 किमी दूर धारचूला घाटी पहुंचे। इसमें हमें पांच दिन लगे ।”

मार्चा गांव के पूर्व ग्राम प्रधान जीवन सिंह मार्चल ने कहा कि दरमा घाटी के 12 अन्य गांवों के ग्रामीण भी निचली घाटियों की ओर जा रहे हैं और 10 नवंबर से पहले वे भी नीचे आ जाएंगे ।

जोहार, दारमा और व्यांस, इन तीन घाटियों के आदिवासी सर्दियों में कड़ाके की ठंड से बचने के लिए परंपरागत रूप से हर साल निचली घाटियों की ओर आ जाते हैं ।

पुराने समय में यह स्थानांतरण व्यापार से भी संबंधित था जब आदिवासी तिब्बती नमक, ऊन और जड़ी-बूटियों के बदले निचली घाटी के किसानों से खाद्यान्न एकत्र करते थे ।

हांलांकि, दारमा घाटी के दांतू गांव के एक ग्रामीण शालू दातल ने कहा कि 1962 में चीन के साथ संघर्ष के बाद भारत-तिब्बत व्यापार बंद होने के बाद चीजें बदल गईं ।

मार्चल ने कहा,‘‘ कभी 50,000 से अधिक भेड़ों से समृद्ध दारमा घाटी में वर्तमान में केवल 500 भेड़-बकरियां हैं क्योंकि अधिकांश ग्रामीणों ने ऊन उत्पादन का काम छोड़ दिया है।’’ उन्होंने कहा कि ऊन उत्पादन के लिए अधिक निवेश की जरूरत होती है और ग्रामीणों द्वारा उत्पादित ऊन का कोई खरीददार नहीं है।



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