‘केलवा के पात पर उगेलन सूरज देव…’ गाते हुए लगता है, सूर्य हमारे बीच ही हैं | Padma Bhushan Sharda Sinha told the worship of nature in Chhath

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धनबाद/पटनाएक घंटा पहले

लोकगायिका शारदा सिन्हा भास्कर के पाठकों को बधाई देते हुए छठ के मायने बता रही हैं। – फाइल फोटो

महापर्व छठ के मायने प्रकृति, समाज, परिवार, शुद्धता और स्वच्छता हैं। भास्कर आपके लिए इसी थीम पर तीन किश्तों की रिपोर्ट लाया है। इसमें खास तौर पर पद्मभूषण प्राप्त लोकगायिका शारदा सिन्हा छठ के मायने बताएंगी। साथ ही धर्म व लोकगीतों में छठ की महिमा का बखान करेंगी। इस पहली रिपोर्ट में छठ के साथ ही धनबाद की भी बात होगी।

‘केलवा के पात पर उगेलन सूरज देव…’ गाते हुए लगता है, सूर्य हमारे बीच ही हैं
शारदा सिन्हा कहती हैं कि प्रकृति से प्रेम, सूर्य और जल की महत्ता का प्रतीक छठ पर्व हमें प्रकृति से जोड़ते हुए पूरे समाज को पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है। इस पर्व पर चढ़ाए जाने वाले केला, दीया, सूथनी, आंवला, बांस का सूप व डलिया कहीं न कहीं हमारे जीवन से जुड़ा हुआ है। प्रकृति ने अन्न दिया, जल दिया, सूर्य का ताप दिया…छठ में इन सभी को पूजते हैं।

वो कहती हैं कि मेरे ससुराल में छठ पर्व होता था। बहुएं बैलगाड़ी पर चढ़कर घाट जाती थीं। घाट पर गाए जाने वाले छठ गीतों की उस मिठास को आज भी महसूस करती हूं। भावनाओं में बहकर गाने लगती हूं…केलवा के पात पर उगे लन सूरज देव झांकी-झुकी… इस गीत में भगवान सूर्य की महिमा का बहुत ही खूबसूरत चित्रण है। गाते हुए ऐसा लगता है, मानो स्वयं सूर्यदेव भक्तों के बीच आ गए हों।

एक पुराने छठ गीत में गायिका शारदा सिन्हा।

एक पुराने छठ गीत में गायिका शारदा सिन्हा।

ज्योतिषाचार्य पंडित रमेशचंद्र त्रिपाठी बता रहे छठ में सूर्य की आराधना का आधार
हिंदू शास्त्रों में प्रकृति और पुरुष सृष्टि के मूलाधार हैं। इनमें प्रकृति मूल तत्व है। आदि माता जगदंबा के मन में इच्छा प्रकट हुई कि सृष्टि का विस्तार किया जाए। उन्होंने अपनी जंघा से तीन देवताओं (आदिपुरुष) ब्रह्मा, विष्णु और महेश को उत्पन्न किया। आदि शक्ति ने तीनों को कार्यभार सौंपा।

वेद बताते हैं कि चर कर्ति, वर हर्ति और जड़ हर्ति। अर्थात उत्पन्न करना, भरण-पोषण करना और संहार। ब्रह्मा को सृष्टि, विष्णु को पालन और महेश को संहार का प्रतीक बनाया गया। सृष्टि में सबसे पहले महर्षि कश्यप आए। उनके बाद मनु और सतरूपा आए, जिनसे मानव की उत्पति हुई। कश्यप ने सूर्य देव का उत्पन्न किया जो आदिकाल से पृथ्वी को अमृतपान कराते आ रहे हैं।

सूर्य से अग्नि, वरुण, पवन, गगन और क्षितिज की उत्पति हुई जो जीव जगत की आधारशिला हैं। छठ मइया प्रकृति स्वरूपा हैं और भगवान सूर्य उनके तत्व। छठ में प्रकृति स्वरूप में विराजमान आदि शक्ति व भगवान सूर्य की भी आराधना की जाती है। सूर्य विष्णुस्वरूप में पालनकर्ता भी हैं।

प्रकृति पूजन की प्रणेता है छठ, धनबाद है इनमें परिपूर्ण, संपन्न, समृद्ध

हिंदू धर्म की संस्कृति रही है प्रकृति की पूजा। नदियों, तालाबों, कुओं, पेड़ों आदि की पूजा हमारी परंपरा में है। लोक आस्था का महापर्व छठ भी मुख्य रूप से प्रकृति से जुड़ा है। इसके लिए पर्व इस भाव से किया जाता है कि प्रकृति ने अन्न दिया-जल दिया-हवा दी, सूर्य ने ताप दिया, सभी को धन्यवाद…। दो ऋतुओं के संक्रमणकाल में शरीर को पित्त और वात की व्याधियों से निरापद रखने के लिए गढ़ा गया अवसर भी छठ है।

छठ में प्रसाद ग्रहण करने के लिए केले और नारियल के पत्तों की टोकरियां का इस्तेमाल किया जाता है। नि:संदेह यह प्रकृति संरक्षण व उपासना का माध्यम है। छठ जिस प्रकृति पूजन की प्रणेता है, उसमें धनबाद सुखद ढंग से परिपूर्ण, संपन्न, समृद्ध है। छठी मइया ने धनबाद को प्रकृति से जुड़ी हर संपन्नता और स्त्रोत प्रचुर मात्रा में नेमत दी है। धनबाद का भाव – हे छठी मइया…बरकत बनाए रखना।

  • वन क्षेत्र…7.56% जमीन जंगल से ढुका, 43 हजार हेक्टेयर में खेती, पहाड़ भी कम नहीं

धनबाद जिला की चौहद्दी 2,88,600 हेक्टेयर में फैली है। इनमें एक सब डिवीजन, 10 प्रखंड व 1209 गांव हैं। प्रकृति की कृपा एेसी कि तेजी से बढ़ती कोयला राजधानी में 21818 हेक्टेयर में वनभूमि है…यानी 7.56 प्रतिशत जमीन वनों से आच्छादित है।

इनमें से अधिकतर इलाके टुंडी, पूर्वी टुंडी, तोपचांची, राजगंज, बरवाअड्डा, बलियापुर, महुदा आदि इलाकों में है। वहीं कुदरत ने धनबाद की मिट्टी को ऐसी ऊर्वराशक्ति भी दी है कि 43000 हेक्टेयर भूमि में खेती-किसानी होती है और धन-धान्य की खूब बरकत होती है।

  • कोयला…112 खदानों से घिरा जिला, गर्भ में 19.4 अरब टन कोकिंग कोल का भंडार

बेहद दुर्लभ और अतुलनीय…प्रकृति ने एेसा उपहार धनबाद को दिया है, वह देश-विदेश में बहुत ही कम भू-भाग को नसीब है। अन्य भू-भाग में जमीन के गर्भ में मिट्टी, पत्थर हैं तो धनबाद के एक बड़े भू-भाग में विशिष्ट श्रेणी का कोकिंग कोल। कोकिंग कोल की डिमांड जहां देश-विदेश में है, वहीं धनबाद की आर्थिक ताकत भी यही है।

धनबाद में 19.4 अरब टन कोकिंग कोक का भंडार है। शहर 112 कोयला खदानों से घिरा हुआ है, जिनसे औसत 27.5 मिलियन टन का उत्पादन होता है। धनबाद ही वह जगह है, जो देश में कोकिंग कोल के उत्पादन में 20 फीसदी ही हिस्सेदारी निभाता है। इस कारण धनबाद को देश की कोयला राजधानी का भी तमगा मिला हुआ है।

  • जलक्षेत्र…हर तरफ नदियों की चहारदीवारी, 1268 तालाब…हर गांव में कम से कम एक

धनबाद जिले की धरती के नीचे एक बड़े भू-भाग में कोयला है तो जीवनधारा की भी कमी नहीं है। धनबाद में छोटी-बड़ी दर्जनभर नदियां हैं, जिनमें बराकर, दामोदर, झिलिया, खुदिया, कतरी, जमुनिया आदि प्रमुख हैं। इनमें दामोदर, बराकर, जमुनिया नदी का पानी धनबाद की प्यास भी बुझाती है।

इन नदियों से पाइपलाइन के जरिए घरों में जलापूर्ति होती है। वहीं जिले में 1268 छोटे-बड़े तालाब हैं। निगम क्षेत्र में जहां 70 तालाब हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में 1198। यानी जिले के हर गांव में कम से कम एक तालाब।

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